बिहार सरकार को झटका : बिहार आरक्षण कानून, 2023 रद्द
बिहार की नीतीश कुमार की सरकार को आज आरक्षण के मुद्दे पर पटना हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। बिहार में अनुसूचित जाति/ दलित (एससी), अनुसूचित जनजाति/ आदिवासी (एसटी), अति पिछड़ा वर्ग (ईबीसी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) का नौकरी और एडमिशन में आरक्षण बढ़ाकर 65 प्रतिशत करने वाले बिहार आरक्षण कानून को पटना हाईकोर्ट ने रद्द करके सीएम नीतीश कुमार को तगड़ा झटका दे दिया है। संविधान के तीन अनुच्छेदों का उल्लंघन बताकर चीफ जस्टिस के विनोद चंद्रन और जस्टिस हरीश कुमार की बेंच ने Bihar Reservation of Vacancies in Posts and Services (Amendment) Act, 2023 और The Bihar (In admission in Educational Institutions) Reservation (Amendment) Act, 2023 को निरस्त किया है। चीफ जस्टिस की अगुवाई वाली पीठ ने सरकार के उस निर्णय को खत्म कर दिया, जिसमें आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 65 प्रतिशत करनेकी बात कही गई थी। आरजेडी के साथ गठबंधन में रहते हुए नीतीश कुमार ने जाति आधारित गणना कराने के बाद यह फैसला किया था। हाईकोर्ट से भले ही झटका लगा है, लेकिन सरकार के पास अभी भी अपने इस फैसले को बरकरार रखना का मौका है। हालांकि इसके लिए उसे केंद्र सरकार के समर्थन की दरकार होगी। हाल ही में संपन्न हुए लोकसभा चुनाव के दौरान विपक्षी दलों ने आरक्षण का मुद्दा जोरदार तरीके से उठाया था। विपक्ष ने आरोप लगाया था कि केंद्र में अगर नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भाजपा दो तिहाई की बहुमत से सरकार बनाने में सफल होती है तो संविधान संशोधन कर आरक्षण को खत्म कर दिया जाएगा। हालांकि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद बार-बार इस बात को दोहराते रहे कि कोई भी आरक्षण को कभी भी खत्म नहीं कर सकता है।
क्या है नौंवीं अनुसूची?
संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल कानूनों को अदालतों में चुनौती नहीं दी जा सकती है। अब तक इस अनुसूची के तहत बने कानूनों की संख्या 284 हो गई है। 1992 में सुप्रीम कोर्ट ने पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत निर्धारित की थी। ऐसे में अगर आरक्षण को लेकर केंद्र सरकार नौवीं अनुसूची को संसोधित करती है तभी यह व्यवस्था स्थायी हो पाएगी। इंदिरा साहनी केस में सुप्रीम कोर्ट के नौ जजों की संविधान पीठ द्वारा 1992 में फैसला दिया गया था कि किसी भी सूरत में आरक्षण 50 प्रतिशत के पार नहीं जा सकता है। हालांकि केंद्र सरकार ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के लिए इस 50 परसेंट से ऊपर 10 प्रतिशत आरक्षण कर दिया। 2022 में सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की बेंच ने 3-2 के फैसले से ईडब्ल्यूएस आरक्षण को सही ठहराया था और दायर याचिकाओं को खारिज कर दिया था। आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों का 10 फीसदी कोटा मिलाकर बिहार में आरक्षण 75 प्रतिशत तक पहुंच गया था।
इन राज्यों की भी है मांग
अब तक कई राज्यों की सरकार ने केंद्र सरकार से आरक्षण की सीमा बढ़ाने की गुजारिश की थी। छत्तीसगढ़ के तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर संविधान की नौवीं अनुसूची में नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण के 76 फीसदी कोटे की अनुमति देने वाले दो संशोधन विधेयकों को शामिल करने की मांग की थी। उससे पहले पिछले साल नवंबर में झारखंड सरकार ने भी राज्य सरकार की नौकरियों में आरक्षण की सीमा बढ़ाकर 77 फीसदी कर दिया था और उसे प्रस्ताव को संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए केंद्र सरकार को चिट्ठी लिखी थी। हालांकि बिहार ऐसा पहला राज्य नहीं है, जहां इस तरह से आरक्षण की लिमिट बढ़ाने की कोशिश को अदालत से झटका लगा है। बिहार से पहले महाराष्ट्र, कर्नाटक और हरियाणा जैसे राज्यों में भी ऐसा हुआ है।
तामिलनाडु में 35 सालों से 69 फीसदी आरक्षण लागू
फिर भी एक राज्य तमिलनाडु ऐसा है, जो अपवाद है। यहां 69 फीसदी आरक्षण बीते करीब 35 सालों से लगातार मिल रहा है। दरअसल वर्ष 1992 के ऐतिहासिक फैसले में शीर्ष अदालत ने इंदिरा साहनी मामले में जातिगत आरक्षण की 50 फीसदी लिमिट तय की थी। ऐसे में यह सवाल उठता है कि फिर तमिलनाडु में क्यों 69 फीसदी का जातीय आरक्षण मिल रहा है। दरअसल यह कहानी लगभग 50 साल पुरानी है। वर्ष 1971 तक तमिलनाडु में 41 फीसदी आरक्षण ही थी। फिर जब अन्नादुरई के निधन के बाद करुणानिधि सीएम बने तो उन्होंने सत्तानाथ आयोग बनाया। इस आयोग की सिफारिश पर उन्होंने 25 फीसदी ओबीसी आरक्षण को बढ़ाकर 31 कर दिया। इसके अलावा एससी-एसटी के कोटे को 16 से बढ़ाकर 18 किया गया। इस तरह राज्य में कुल जातीय आरक्षण बढ़कर 49 फीसदी हो गया। इसके बाद 1980 में आई एआईएडीएमके सरकार ने पिछड़ा वर्ग का कोटा बढ़ाकर 50 फीसदी कर दिया। एससी-एसटी का 18 पर्सेंट था ही। इस तरह कुल आरक्षण राज्य में 68 पर्सेंट हो गया। इसके बाद 1989 में करुणानिधि की जब सरकार आई तो इस कोटे में ही 20 फीसदी आरक्षण अति पिछड़ा के लिए अलग से दिया गया। इसके बाद 1990 में मद्रास हाई कोर्ट के फैसले के बाद 18 फीसदी एससी आरक्षण के अलावा एसटी कोटा 1 फीसदी अलग से दिया गया। इस तरह कुल कोटा राज्य में बढ़कर 69 फीसदी हो गया।
प्रमुख बिंदु:
- पटना हाईकोर्ट का फैसला: पटना हाईकोर्ट ने नीतीश कुमार सरकार द्वारा आरक्षण की सीमा को 50% से बढ़ाकर 65% करने के फैसले को रद्द कर दिया।
- आरक्षण की सीमा: यह निर्णय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने आरजेडी के साथ गठबंधन में रहते हुए जाति आधारित गणना के बाद लिया था।
- केंद्र सरकार का समर्थन: इस फैसले को बरकरार रखने के लिए बिहार सरकार को केंद्र सरकार के समर्थन की जरूरत होगी।
- विपक्ष का आरोप: विपक्ष ने लोकसभा चुनाव के दौरान आरक्षण का मुद्दा जोरदार तरीके से उठाया और केंद्र सरकार पर आरक्षण को खत्म करने का आरोप लगाया।
- प्रधानमंत्री का बयान: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बार-बार इस बात को दोहराया कि आरक्षण को कभी भी खत्म नहीं किया जाएगा।
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